रविवार, 9 जनवरी 2022

श्रीमद भगवद गीता अध्याय 2 के श्लोक 16 और 17

 श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 के श्लोक 16 और 17  --- इन श्लोकों में तत्वदर्शीयों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि असत् (भौतिक शरीर) का तो कोई चीर स्थायित्व  नहीं है , किंतु सत् (आत्मा) अपरिवर्तित रहता है ।उन्होंने इन दोनों की प्रकृति के अध्ययन द्वारा यह निष्कर्ष निकाला है ।जो सारे शरीर में व्याप्त है उसे ही तुम अविनाशी समझो । उस अव्यय आत्मा को नष्ट करने में कोई भी समर्थक नहीं है ।

       आत्मा का विज्ञान -- श्रीमद भगवत गीता के अध्याय 2 के श्लोक 16 और 17 मैं आत्मा का विज्ञान समझाया गया है । जिस प्रकार परिवर्तनशील शरीर का कोई स्थायीत्व नहीं है । विभिन्न कोशिकाओं की क्रिया -प्रतिक्रिया द्वारा शरीर प्रतिक्षण बदलता रहता है । इस तरह शरीर में जो वृद्धि होती है उससे ही हम वृद्धावस्था तक पहुंचते हैं ,किंतु शरीर तथा मन में निरंतर परिवर्तन होने पर भी आत्मा स्थाई रहती है । यही पदार्थ तथा आत्मा का अंतर है ।

                   शरीर नित्य परिवर्तनशील है और आत्मा शाश्वत है। यहीं से भगवान द्वारा अज्ञान से मोह ग्रस्त जीवो को उपदेश देने का शुभारंभ होता है ।अज्ञान को हटाने के लिए आराधक और आराध्य के बीच पुन: शाश्वत संबंध स्थापित करना होता है और फिर अंश रूप जीवों तथा श्री भगवान के अंतर को समझना होता है। कोई भी व्यक्ति आत्मा के अध्ययन द्वारा परमेश्वर के स्वभाव को समझ सकता है-- आत्मा तथा परमात्मा का अंतर अंश तथा पूर्ण के अंतर के रूप में है। यद्यपि शक्ति तथा शक्तिमान में कोई अंतर नहीं है किंतु शक्तिमान को परम माना जाता है और शक्ति या प्रकृति को गौण ।

                        अतः सारे जीव उसी तरह परमेश्वर के सदैव अधीन रहते हैं जिस तरह सेवक स्वामी के या शिष्य गुरु के अधीन रहता है। अज्ञानावस्था में ऐसे स्पष्ट ज्ञान को समझ पाना असंभव है ।अतः ऐसे अज्ञान को दूर करने के लिए सदा सर्वदा के लिए जीवो को प्रबुद्ध करने हेतु भगवान भगवत गीता का उपदेश देते हैं ।

                 17वें  श्लोक में संपूर्ण शरीर में व्याप्त आत्मा की प्रकृति का अधिक स्पष्ट वर्णन हुआ है। सभी यह समझते हैं कि जो सारे शरीर में व्याप्त है वह चेतना है। प्रत्येक व्यक्ति को शरीर में किसी अंश या पूरे भाग में सुख -दुख का अनुभव होता है ,किंतु चेतना कि यह व्याप्ति किसी के शरीर तक ही सीमित रहती है। एक शरीर के सुख तथा दुख का बोध दूसरे शरीर को नहीं हो पाता । अतः प्रत्येक शरीर में व्यष्टि आत्मा है और इस आत्मा की उपस्थिति का लक्षण व्यष्टि चेतना द्वारा परिलक्षित होता है ।

                 इस प्रकार आत्मा का प्रत्येक कण भौतिक परमाणुओं से भी छोटा है और ऐसे असंख्य कम है। यह अत्यंत लघु आत्म - स्फुलिंग भौतिक शरीर का मूल आधार है और इस आत्म - स्फुलिंग का प्रभाव सारे शरीर में उसी तरह व्याप्त है जिस प्रकार किसी औषधि का प्रभाव व्याप्त रहता है ।आत्मा की यह धारा सारे शरीर में चेतना के रूप में अनुभव की जाती है और यही आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण है । सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी समझ सकता है कि यह भौतिक शरीर चेतना रहित होने पर मृतक हो जाता है और शरीर में इस चेतना को किसी भी भौतिक उपचार से वापस नहीं लाया जा सकता।

           अनु आत्मा का प्रभाव पूरे शरीर में व्याप्त हो सकता है इसे हम अलग-अलग उपनिषदों द्वारा भी समझ सकते हैं --

   मुंडक उपनिषद में (3;1;9 )में--  सूक्ष्म आत्मा की और अधिक विवेचना हुई है ---"आत्मा आकार में अणु तुल्य है जिसे पूर्ण बुद्धि के द्वारा जाना जा सकता है। यह अणु -आत्मा पांच प्रकार के प्राणों में तैर रहा है (प्राण ,अपान ,व्यान ,समान तथा उदान ) ।यह हृदय के भीतर स्थित है और देवधारी जीव के पूरे शरीर में अपने प्रभाव का विस्तार करता है। जब आत्मा को पांच वायु के कल्मष से शुद्ध कर लिया जाता है तो इसका आध्यात्मिक प्रभाव प्रकट होता है ।"

    मुंडक उपनिषद के ही अनुसार --- यह अणु- आत्मा प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित है और चूॅकि भौतिक विज्ञानी इस अणु - आत्मा को माप सकने में असमर्थ है । अतः उनमें से कुछ यह अनुभव करते हैं कि आत्मा है ही नहीं ।व्यष्टि आत्मा तो निसंदेह परमात्मा के साथ-साथ ह्रदय में है और इसीलिए शारीरिक गतियों की सारी शक्ति शरीर के इसी भाग से उद्भूत है ।

    श्वेताश्वतर उपनिषद में (5:9)  --- मैं इसकी पुष्टि हुई है -" यदि बाल के अग्रभाग को एक सौ भागों में विभाजित किया जाए और फिर इनमें से प्रत्येक भाग को एक सौ भागों में विभाजित किया जाए तो इस तरह के प्रत्येक  भाग की माप आत्मा का परिमाप है। "

      विष्णु पुराण में (2;12; 38) में -- कहां गया है कि विष्णु तथा उनके धाम स्वयं प्रकाश से प्रकाशित है ।सत् तथा असत् शब्द आत्म तथा भौतिक पदार्थ की ही द्योतक  है । सभी तत्वदर्शीयों  की यह स्थापना है ।

  वेदांत सूत्र--  तथा श्रीमद्भागवत  में परमेश्वर को समस्त उद्भवों (प्रकाश)  का मूल माना गया है ।ऐसे उद्भवों का अनुभव परा  तथा अपरा प्राकृतिक  -क्रमो द्वारा किया जाता है ।

   हठयोग। -- का प्रयोजन विभिन्न आसनों द्वारा उन पांच प्रकार के प्राणों को नियंत्रित करना है, जो आत्मा को घेरे हुए हैं ।यह योग किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं अपितु भौतिक आकाश के बंधन से अणु आत्मा की मुक्ति के लिए किया जाता है ।आत्मा के परमाणुओं के अनंत कण है जो माप में बाल के अगले भाग के 10,000 वें भाग के बराबर है ।

             इस प्रकार अणु - आत्मा को सारे वैदिक साहित्य ने स्वीकारा है और प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति अपने व्यावहारिक अनुभव से इसका प्रत्यक्ष अनुभव करता है। केवल मूर्ख व्यक्ति ही इस अनु आत्मा को सर्वव्यापी विष्णु तत्व के रूप में सोच सकता है ।

     व्यष्टि आत्मा तो निसंदेह परमात्मा के साथ-साथ हृदय में है और इसीलिए शारीरिक  गतिरोध की सारी शक्ति शरीर के इसी भाग से उद्भूत  है जो लाल रक्त कण फेफड़ों से ऑक्सीजन ले जाते हैं वे आत्मा से ही शक्ति प्राप्त करते हैं। अतः जब आत्मा इस स्थान से निकल जाती है तो रक्तो उत्पादक संलयन बंद हो जाता है। औषधि विज्ञान लाल रक्त कणों की महत्ता को तो स्वीकार करता है ,किंतु वह यह सुनिश्चित नहीं कर पाता की शक्ति का स्त्रोत आत्मा है जो भी हो औषधि विज्ञान यह स्वीकार करता है कि शरीर की सारी शक्ति का उद्गम स्थल हृदय है ।

        पूर्ण आत्मा के ऐसे अणु कणों की तुलना सूर्य प्रकाश के कणों से की जाती है। इस सूर्य प्रकाश में असंख्य तेजोमय अणु होते हैं ।इसी प्रकार परमेश्वर के अंश उनकी  किरणों के परमाणु स्फुलिंग है और प्रभाव या पराशक्ति कहलाते हैं। 

           आत:   चाहे कोई वैदिक ज्ञान का अनुगामी हो या आधुनिक विज्ञान का ,वह शरीर में आत्मा के अस्तित्व को नकार नहीं सकता। भगवान ने स्वयं भगवत गीता में आत्मा के इस विज्ञान का विशद वर्णन किया है।

                      जय जय श्री राधे

                                                        प्रणाम

                                                      अन्नपूर्णा शर्मा

श्रीमद भगवद गीता अध्याय


English Translation 

Title - Shlok 16 and 17 of Shrimad Bhagavad Gita Adhyay 2

Shlok 16 and 17 of Shrimad Bhagavad Gita Adhyay 2 --- In these verses, the Tatvdarshis have concluded that there is no permanent permanence of Asat (Material Body), but Sat (Soul) remains unchanged. He studied the nature of these two. It is concluded by this. Only that which pervades the whole body, you consider it to be imperishable. No one is supportive of destroying that imperishable soul.


       Science of the soul - The science of soul has been explained in Shlok 16 and 17 of Adhyay 2 of Shrimad Bhagwat Geeta. Just as a changing body has no permanence. The body keeps on changing every moment by the action-reaction of different cells. In this way, we reach old age only by the growth that takes place in the body, but the soul remains permanent even if there is constant change in the body and mind. This is the difference between matter and spirit.


                   The body is ever-changing and the soul is eternal. It is from here that the Lord begins preaching to the living beings who are enamored of ignorance. To remove ignorance, the eternal relationship between the worshiper and the adoration has to be established again and then the difference between the living beings in the form and Sri Bhagavan has to be understood. One can understand the disposition of the Supreme Lord by the study of the soul--the difference between the soul and the Supreme is as the difference between the part and the whole. Although there is no difference between Shakti and Shaktimaan, Shaktimaan is considered to be the ultimate, and Shakti or Prakriti is secondary.


                        Therefore, all living beings are always subject to the Supreme Lord in the same way as the servant remains under the master or the disciple is under the master. It is impossible to understand such clear knowledge in the state of ignorance. Therefore, to remove such ignorance, the Lord always preaches the Bhagavad Gita to enlighten the living beings forever and ever.


                 In the 17th verse, there is a more clear description of the nature of the soul pervading the entire body. Everyone understands that that which pervades the whole body is consciousness. Everyone experiences pleasure and pain in some part or the whole of the body, but the consciousness that this pervasiveness is limited to one's body. The pleasure and pain of one body cannot be perceived by another body. Therefore in everybody, there is an individual soul and the symptom of the presence of this soul is reflected by the individual consciousness.


                 Thus every particle of the soul is smaller than even the physical atoms and there are innumerable fewer of such. This very small self-splashing is the basic foundation of the physical body and the effect of this self-splashing pervades the whole body in the same way as the effect of any medicine pervades the whole body. And this is proof of the existence of the soul. Even a normal person can understand that this physical body becomes dead when it becomes unconscious and this consciousness in the body cannot be brought back by any physical treatment.


           The effect of Anu Atman can be pervasive in the whole body, we can also understand it through different Upanishads -


   In the Mundaka Upanishad (3;1;9)-- the subtle soul is further discussed---"The soul is like an atom in size which can be known by the perfect intellect. It is floating (prana, apana, vyana, samaan and udana). It is situated within the heart and extends its effect to the whole body of the deity. The spiritual effect appears."


    According to the Mundaka Upanishad itself, this atomic soul is situated in the heart of every living being, and since the physicist is unable to measure this atomic soul. Therefore some of them feel that there is no soul at all. The individual soul is undoubtedly in the heart along with the Supreme Soul and that is why all the power of bodily movements emanates from this part of the body.


    In the Shvetashvatara Upanishad (5:9)--- I have confirmed this - "If the hair's head is divided into one hundred parts and then each of these parts is divided into one hundred parts, then each such part The measure of the soul is the measure of the soul."


      In Vishnu Purana (2; 12; 38) - Where has it been said that Vishnu and his abode are illumined by light itself. This is the establishment of all the Tatvdarshis.


  In the Vedanta Sutras and Srimad Bhagavatam, the Supreme Lord is considered to be the origin of all emergencies (light). Such emergencies are experienced through the Para and Apara natural orders.


   Hatha Yoga. The purpose of the various asanas is to control the five types of pranas that surround the soul. This yoga is done not for any material gain but for the liberation of the atomic soul from the bondage of the material sky. There are infinite particles of atoms which in the measure are equal to 10,000th part of the next part of the hair.


             Thus the atomic soul has been accepted by all the Vedic literature and every intelligent person experiences it directly through his practical experience. Only a foolish person can think of this anu soul as the omnipresent Vishnu element.


     The individual soul is undoubtedly in the heart along with the Supreme Soul and that is why all the power of physical impediment emanates from this part of the body. Therefore, when the soul leaves this place, the blood-producing fusion stops. goes. Medical science accepts the importance of red blood cells, but it cannot be sure that the source of energy is the soul.


        Such atomic particles of the perfect soul are compared with the particles of sunlight. There are innumerable luminous molecules in this sunlight. Similarly, the portions of the Supreme Lord are the atomic sparks of His rays and are called Prabhava of Parashakti.


           At the same time, whether one is a follower of Vedic knowledge or modern science, he cannot deny the existence of the soul in the body. The Lord himself has given a vivid description of this science of the soul in the Bhagavad Gita.


                      Hail Hail Lord Radhe


                                                        Greetings


                                                      Annapurna Sharma

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

श्रीमद भगवद गीता अध्याय 2 के श्लोक 13 14 और 15

 श्रीमद भगवत गीता अध्याय 2 के श्लोक 13 14 और 15 --- हे पुरुष श्रेष्ठ (अर्जुन ) !जो पुरुष सुख तथा दुख में विचलित नहीं होता और इन दोनों में समभाव रखता है, वह निश्चित रूप से मुक्ति के योग्य है ।  हे कुंतीपुत्र !सुख तथा दुख का क्षणिक उदय तथा कालक्रम में उनका अंतर्धान होना ,सर्दी तथा गर्मी की ऋतु के आने जाने के समान है  । हे भारतवंशी ! वे इंद्रिय बोध से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य को चाहिए कि अविचल भाव से उनको सहन करना सीखें  । जिस प्रकार शरीर धारी आत्मा इस (वर्तमान ) शरीर में बाल्यावस्था से तरुण अवस्था में और फिर वृद्धावस्था में निरंतर अग्रसर होती रहती है। उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है ।  धीर व्यक्ति ऐसे परिवर्तन से मोह को प्राप्त नहीं होता । 

   श्लोक का सार -- गीता में कृष्ण द्वारा अर्जुन को मुक्ति का ज्ञान देना

                    प्रत्येक जीव एक व्यष्टि आत्मा है  । वह प्रतिक्षण अपना शरीर बदलता रहता है -- कभी बालक के रूप में, कभी युवा तथा कभी वृद्ध पुरुष के रूप में ,तो भी आत्मा वही रहती है उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता ।  यह व्यष्टि आत्मा मृत्यु होने पर अन्ततोगत्वा  एक शरीर बदलकर दूसरे शरीर में देहांतरण कर जाता है और चूॅकि अगले जन्म में इसको शरीर मिलना अवश्यंभावी है -- चाहे वह शरीर आध्यात्मिक हो या भौतिक -- अतः अर्जुन के लिए ना तो भीष्म न ही द्रोण के लिए जो करने का कोई कारण था अपितु उसे प्रसन्न होना चाहिए था कि वह अपने पुराने शरीरों को बदलकर नये शरीर ग्रहण करेंगे और इस तरह वे नई शक्ति प्राप्त करेंगे ।  ऐसे शरीर परिवर्तन से जीवन में किए कर्म के अनुसार नाना प्रकार के सुखोपभोग  या कष्टों का लेखा हो जाता है ।  चूॅकि भीष्म व द्रोण साधु पुरुष थे इसलिए अगले जन्म में उन्हें आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होंगे,  नहीं तो कम से कम उन्हें स्वर्ग में भोग करने के अनुरूप शरीर तो प्राप्त होंगे ही अतः दोनों ही दशाओ में शोक का कोई कारण नहीं था ।

       जिस मनुष्य को व्यष्टि आत्मा- परमात्मा तथा भौतिक और आध्यात्मिक प्रकृति का पूर्ण ज्ञान होता है वह धीर कहलाता है ।  ऐसा मनुष्य कभी भी शरीर परिवर्तन द्वारा ठगा नहीं जाता ।

   आत्मा के एकात्मवाद  का माया वादी सिद्धांत मान्य नहीं हो सकता क्योंकि आत्मा के इस प्रकार विखंडन से परमेश्वर विखंडनीय  या परिवर्तनशील हो जाएगा, जो परमात्मा के अपरिवर्तनीय होने के सिद्धांत के विरुद्ध होगा ।  गीता में पुष्टि हुई है कि परमात्मा के खंडों का शाश्वत( सनातन )अस्तित्व है, जिन्हें  क्षर कहा जाता है अर्थात उनमें भौतिक प्रकृति में गिरने की प्रवृत्ति होती है ।  ये भिन्न  अंश (खंड) नित्य भिन्न रहते हैं ,यहां तक कि मुक्ति के बाद भी व्यष्टि आत्मा जैसे का तैसा -- भिन्न अंश -- बना रहता है  । किंतु एक बार मुक्त होने पर वह श्री भगवान के साथ सच्चिदानंद रूप में रहता है ।  परमात्मा पर प्रतिबिंब वाद का सिद्धांत लागू किया जा सकता है। जो प्रत्येक शरीर में विद्यमान रहता है। वह व्यष्टि जीव से भिन्न होता है । जब आकाश का प्रतिबिंब जल में पड़ता है तो प्रतिबिंब में सूर्य, चंद्र की परमेश्वर से की जा सकती है व्यष्टि अंश आत्मा को अर्जुन के रूप में और परमात्मा को श्री भगवान के रूप में प्रदर्शित किया जाता है । जैसा कि चतुर्थ अध्याय के प्रारंभ में स्पष्ट है ,वह एक ही स्तर पर नहीं होते यदि अर्जुन कृष्ण के समान स्तर पर हो और कृष्ण अर्जुन से श्रेष्ठतर ना हो तो उनमें उपदेशक तथा उपदिष्ट का संबंध अर्थहीन होगा । यदि ये दोनों माया द्वारा मोहित होते हैं तो एक को उपदेशक तथा दूसरे को उपदिष्ट होने की कोई भी प्रमाणिक उपदेशक नहीं बन सकता ।  ऐसी परिस्थितियों में यह मान लिया जाता है कि भगवान कृष्ण परमेश्वर है जो पद में माया द्वारा विस्मित अर्जुन रूपी जीव से श्रेष्ठ हैं ।

     जिस प्रकार शरीर छोड़ने से पहले -- केवल कुछ पलों के लिए आत्मा अपनी शक्ति से शरीर को शत प्रतिशत सजीव करती है  --ताकि उसके निकलने का मार्ग अवरुद्ध ना रहे और फिर उसी समय आत्मा निकल जाती है और शरीर खाली मकान की तरह निर्जीव रह जाता है ।

        कर्तव्य निर्वाह करते हुए मनुष्य को सुख तथा दुख के क्षणिक आने जाने को सहन करने का अभ्यास करना चाहिए । वैदिक आदेशानुसार मनुष्य को माघ ( जनवरी -फरवरी) के मास में भी प्रातः काल स्नान करना चाहिए । उस समय अत्यधिक ठंड पड़ती है किंतु जो धार्मिक नियमों का पालन करने वाला होता है वह स्नान करने में तनिक भी झिझकता नहीं है ।इसी प्रकार एक ग्रहणी भीषण से भीषण गर्मी की ऋतु में (मई-जून) के महीनों में भोजन पकाने में हिचकती  नहीं ।जलवायु संबंधी  असुविधाएं होते हुए भी मनुष्य को अपना कर्तव्य निभाना होता है ।इसी प्रकार युद्ध करना क्षत्रिय का धर्म है अतः उसे अपने किसी मित्र या परिजन से भी युद्ध करना पड़े तो उसे अपने धर्म से विचलित नहीं होना चाहिए ।मनुष्य को ज्ञान प्राप्त करने के लिए धर्म के विधि  -विधान पालन करने होते हैं क्योंकि ज्ञान तथा भक्ति से ही मनुष्य अपने आप को माया के बंधन से छुडा सकता है ।

     अर्जुन को जिन दो नामों से संबोधित किया गया है वह भी महत्वपूर्ण है ।कौन्तेय कह कर संबोधित करने से यह प्रकट होता है कि वह अपनी माता की ओर (मातृ-कुल ) से संबंधित है और भारत कहने से उसके पिता की ओर (पितृ कुल )से संबंध प्रकट होता है दोनों ओर से उसको महान विरासत प्राप्त है महान विरासत प्राप्त होने के फलस्वरूप कर्तव्य निर्वाह का उत्तरदायित्व आ पड़ता है अतः अर्जुन युद्ध से विमुख नहीं हो सकता ।

      जो व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार की उच्च अवस्था प्राप्त करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है और सुख तथा दुख के प्रकारों को समभाव से सह सकता है । वह निश्चय ही मुक्ति के योग्य है ।वर्णाश्रम धर्म में चौथी अवस्था अर्थात सन्यास आश्रम कष्ट साध्य अवस्था है, किंतु जो अपने जीवन को सचमुच पूर्ण बनाना चाहता है वह समस्त कठिनाइयों के होते हुए भी सन्यास आश्रम अवश्य ग्रहण करता है। यह कठिनाइयां पारिवारिक संबंध विच्छेद करने तथा पत्नी और संतान से संबंध तोड़ने के कारण उत्पन्न होती है ।किंतु यदि कोई इन कठिनाइयों को सह लेता है तो उसके आत्मसाक्षात्कार का पथ निष्कंटक हो जाताहै।

              अत: अर्जुन को क्षत्रिय धर्म निर्वाह में दृढ़ रहने के लिए कहा जा रहा है, भले ही स्वजनों या अन्य प्रिय व्यक्तियों के साथ युद्ध करना कितना ही दुष्कर क्यों ना हो?

        भगवान चैतन्य ने 24 वर्ष की अवस्था में ही सन्यास ग्रहण कर लिया था ।यद्यपि उन पर आश्रित उनकी तरुण पत्नी तथा वृद्धा मां की देखभाल करने वाला अन्य कोई ना था, तो भी उच्चादर्श के लिए उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और अपने कर्तव्य पालन में स्थिर बने रहे भव बंधन से मुक्ति पाने का यही एकमात्र उपाय है ।

               जय जय श्री राधे

                                                       प्रणाम

                                               अन्नपूर्णा शर्मा

krishna

English Translation 

Title - Shlok 13 14 and 15 of Shrimad Bhagavad Gita Adhyay 2

Shlok 13, 14 and 15 of Shrimad Bhagavad Gita Adhyay 2 --- O best man (Arjuna)! The man who does not get distracted in happiness and sorrow and has equanimity in both, he is definitely worthy of liberation. O son of Kunti! The momentary rise of happiness and sorrow and their disappearance in time is like the coming and going of the seasons of winter and summer. O Indians! They arise out of sense perception and one must learn to tolerate them with unsteadiness. Just as the soul in the body continues to progress in this (present) body from childhood to youth and then to old age. Similarly, upon death, the soul moves to another body. A patient person does not get deluded by such a change.


   Essence of Shloka - Gita giving knowledge of salvation to Arjuna by Krishna


                    Every living being is an individual soul. He keeps on changing his body every moment - sometimes as a child, sometimes as a young man and sometimes as an old man, yet the soul remains the same, there is no change in it. This individual soul, upon death, eventually changes from one body to another, and since it is inevitable to get a body in the next life - whether that body is spiritual or material - it is neither Bhishma nor Drona for Arjuna. Whatever there was a reason to do, he should have been happy that he would replace his old bodies with new ones and thus gain new energy. Due to such a change in the body, according to the karma done in life, various types of pleasures or sufferings are accounted for. Since Bhishma and Drona were sages, they would get spiritual bodies in the next life, otherwise at least they would get bodies according to the enjoyment in heaven, so there was no reason for mourning in both the cases.


       The person who has complete knowledge of the individual soul-the Supreme Soul and the material and spiritual nature is called Dhir. Such a man is never deceived by a change of body.


   The Maya Vadi theory of the oneness of the soul cannot be accepted because such a disintegration of the soul would make the Supreme Lord fissile or changeable, which would be against the principle of God being immutable. It is confirmed in the Gita that there is an eternal existence of the segments of the Supreme Soul, which are called Kshara, that is, they have the tendency to fall into the material nature. These fractions (sections) are eternally different, even after liberation, the individual soul remains as it is - a different part. But once freed, he lives with Sri Bhagavan in the form of Sachchidananda. The principle of reflection can be applied to God. which is present in every body. He is different from the individual. When the image of the sky falls in the water, the image of the Sun and the Moon can be done with the Supreme Personality of Godhead. As is evident at the beginning of Chapter IV, they are not on the same level; if Arjuna is on the same level as Krishna and Krishna is not superior to Arjuna, the relationship between the preceptor and the upadishta would be meaningless. If both of them are enchanted by Maya, then one cannot become a preceptor and the other can be a real preacher. Under such circumstances it is assumed that Lord Krishna is the Supreme Personality of Godhead who is superior to Arjuna in the form of a soul stunned by Maya.


     Just as before leaving the body - for only a few moments the soul animates the body 100 percent by its power - so that the path of its exit is not obstructed and then at the same time the soul leaves and the body remains lifeless like an empty house. goes .


        While performing the duty, one should practice to tolerate the momentary coming and going of happiness and sorrow. According to the Vedic order, one should take a bath early in the morning even in the month of Magha (January-February). It is extremely cold at that time, but the one who follows the religious rules does not hesitate to take a bath. Similarly, a duodenum does not hesitate to cook food in the months of scorching heat (May-June) In spite of the inconveniences related to the climate, man has to perform his duty. Similarly, fighting is the religion of Kshatriya, so if he has to fight with any of his friends or relatives, he should not deviate from his religion. For this, the rules and regulations of religion have to be followed because only by knowledge and devotion a man can free himself from the bondage of Maya.


     The two names by which Arjuna is addressed are also important. Addressing him as Kaunteya indicates that he is related to his mother's side (Matri-kula) and Bharata to his father's side (Pitr-kula). The relation is manifested from both the sides, he has got a great inheritance, as a result of getting a great inheritance comes the responsibility of fulfilling the duty, so Arjuna cannot get away from the war.


      A person who is determined to attain the highest stage of Self-realization and can bear the types of happiness and sorrow with equanimity. He is definitely worthy of liberation. The fourth stage in Varnashrama dharma i.e. Sanyasa Ashram is a difficult stage, but one who really wants to make his life perfect, he must take Sanyas Ashram in spite of all difficulties.

, These difficulties arise due to severance of family ties and breaking ties with wife and children. But if one bears these difficulties, then the path of his self-realization becomes flawless.


              Therefore Arjuna is being asked to persevere in the Kshatriya dharma, no matter how difficult it may be to fight with loved ones or other dear ones?


        Lord Caitanya had taken sannyas at the age of 24. Although there was no one dependent on him to take care of his young wife and old mother, yet for the sake of higher ideals he took sannyas and remained steadfast in performing his duty. This is the only way to get rid of the bondage of Bhava.


               Hail Hail Lord Radhe


                                                       Greetings


                                               Annapurna Sharma

गुरुवार, 23 दिसंबर 2021

श्रीमद भगवद गीता अध्याय 2 का श्लोक 12

 श्रीमद भगवद गीता अध्याय 2 का श्लोक 12.  --- ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैं ना रहा हूं या तुम ना रहे हो अथवा यह समस्त राजा ना रहे हो और ना ऐसा है कि भविष्य में हम लोग नहीं रहेंगे  ।

  अलग-अलग उपनिषदों की चर्चा करते हुए अर्जुन को गीता में धर्म की परिभाषा समझाना ---- वेदों में कठोपनिषद तथा श्वेताश्वतर उपनिषद में भी कहा गया है कि जो श्री भगवान असंख्य जीवो के कर्म  तथा कर्म फल  के अनुसार उनकी अपने-अपने परिस्थितियों में पालक हैं ,वही भगवान अंश रूप में हर जीव के हृदय में वास कर रहे हैं । केवल साधु पुरुष जो एक ही ईश्वर को भीतर बाहर देख सकते हैं पूर्ण एवं शाश्वत शांति प्राप्त कर पाते हैं ।

          जो वैदिक ज्ञान श्री कृष्ण ने अर्जुन को प्रदान किया वहीं विश्व के उन समस्त पुरुषों को प्रदान किया जाता है जो विद्वान होने का दावा तो करते हैं किंतु जिनकी ज्ञान राशि न्यून है  । भगवान यह स्पष्ट कहते हैं कि वह स्वयं अर्जुन तथा युद्ध भूमि में एकत्र सारे राजा शाश्वत प्राणी है और इन जीवो की बद्ध तथा मुक्त अवस्थाओ में भगवान ही एकमात्र उनके पालक हैं  । भगवान परम पुरुष तथा भगवान का चिर संगी अर्जुन एवं वहां पर एकत्र सारे राजा गण शाश्वत पुरुष है  । ऐसा नहीं है कि भूतकाल में प्राणियों के रूप में अलग-अलग उपस्थित नहीं थे और ऐसा भी नहीं है कि ये शाश्वत पुरुष बने रही नहीं रहेंगे  । उनका अस्तित्व भूतकाल में था और भविष्य में भी निर्बाध रूप से बना रहेगा  । अतः किसी के लिए शोक करने की कोई बात नहीं है ।

               श्री कृष्ण भगवत गीता के माध्यम से गीता में धर्म की परिभाषा बताते हुए कहते हैं कि --- यह माया वादी सिद्धांत की मुक्ति के बाद आत्मा माया के आवरण से पृथक होकर निराकार ब्रह्म में लीन हो जाएगा और अपना अस्तित्व खो देगा ।  यहां पर परम अधिकारी भगवान कृष्ण द्वारा पुष्ट नहीं हो पाता ,न हीं इस सिद्धांत का समर्थन हो पाता है कि बस अवस्था में ही हम अस्तित्व का चिंतन करते हैं  । यहां  पर कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि भगवान तथा अन्यो का अस्तित्व भविष्य में भी अक्षुण्ण रहेगा जिसकी पुष्टि उपनिषदों द्वारा भी होती है  । कृष्ण का यह कथन प्रामाणिक है क्योंकि कृष्ण माया वश्य  नही है  । यदि अस्तित्व तथ्य न होता तो फिर कृष्ण इतना बल क्यों देते  और वह भी भविष्य के लिए ।

           मायावादी यह तर्क कर सकते हैं कि कृष्ण द्वारा कथित अस्तित्व आध्यात्मिक ना होकर भौतिक है ।  यदि हम इस तर्क को, की अस्तित्व भौतिक होता है, स्वीकार कर भी लें तो फिर कोई कृष्ण के अस्तित्व को किस प्रकार पहचानेगा ? कृष्ण भूतकाल में भी अपने अस्तित्व की पुष्टि करते हैं और भविष्य में भी अपने अस्तित्व की पुष्टि करते हैं  । कृष्ण सदा सर्वदा अपना अस्तित्व बनाए रखते  हैं ।  यदि उन्हें सामान्य चेतना वाले सामान्य व्यक्ति के रूप में माना जाता है तो प्रमाणिक शास्त्र के रूप में उनकी भगवद गीता की कोई महत्ता नहीं होगी  । एक सामान्य व्यक्ति मनुष्यों के चार अवगुणों  के कारण श्रवण करने योग्य शिक्षा देने में असमर्थ रहता है ।  गीता ऐसे साहित्य से ऊपर है ।  कोई भी संसारी ग्रंथ गीता की तुलना नहीं कर सकता ।

           श्रीकृष्ण को सामान्य व्यक्ति मान लेने पर गीता की सारी महत्ता जाती रहती है ।  माया वादियों का तर्क है कि इस श्लोक  में वर्णित द्वैत  लौकिक है और शरीर के लिए प्रयुक्त हुआ है ।  गीता में कई स्थलों पर इसका उल्लेख है कि यह आध्यात्मिक अस्तित्व केवल भगवत भक्तों द्वारा ज्ञेय हैं, जो लोग भगवान कृष्ण का विरोध करते हैं उनकी इस महान साहित्य तक पहुंच नहीं हो पाती है  ।अभक्तों द्वारा गीता के उपदेशों को समझने का प्रयास मधुमक्खी द्वारा मधु पात्र चाटने के सदृश हैं  । पात्र को खोले बिना मधु को नहीं चखा जा सकता । इसी प्रकार भगवत गीता के रहस्यवाद को केवल भक्त ही समझ सकते हैं अन्य कोई नहीं । आत: मायावादियों द्वारा गीता की व्याख्या मानो समग्र सत्य का सरासर भ्रामक निरूपण है ।

            भगवान चैतन्य ने माया वादियों द्वारा की गई गीता की व्याख्या ओं को पढ़ने का निषेध किया है ।  और चेतावनी दी है कि जो कोई ऐसे मायावती दर्शन को ग्रहण करता है वह गीता के वास्तविक रहस्य को समझ पाने में असमर्थ रहता है ।  यदि अस्तित्व का अभिप्राय अनुभवगम्य  ब्रह्मांड से है तो भगवान द्वारा उपदेश देने की कोई आवश्यकता नहीं थी  । आत्मा तथा परमात्मा का द्वैत शाश्वत तथ्य है और इसकी पुष्टि वेदों द्वारा होती है जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है ।

                          जय जय श्री राधे

                                                               प्रणाम

                                                      अन्नपूर्णा शर्मा


English Translation 

Title - Shrimad Bhagavad Geeta Chapter 2's Shlok 12

Shlok 12 of Shrimad Bhagavad Gita Adhyay 2 --- It has never happened that I have not lived or you have not lived or have not been all these kings and it is not that we will not be there in future.

 Discussing the different Upanishads, explaining the definition of religion in the Gita to Arjuna ---- in the Vedas, it has been said in the Kathopanishad and also in the Shvetasvatara Upanishad that the Lord who is innumerable living beings according to their own circumstances, according to their actions and results.  He is the guardian, the same God is residing in the heart of every living being in a part form.  Only sages who can see the same God within and out can attain complete and eternal peace.

 The Vedic knowledge which Shri Krishna imparted to Arjuna, is imparted to all those men of the world who claim to be scholars but whose knowledge amount is less.  The Lord clearly states that He Himself Arjuna and all the kings gathered in the battlefield are eternal beings and that in the conditioned and liberated states of these beings, the Lord is their only guardian.  Arjuna, the Supreme Personality of Godhead and the eternal companion of the Lord, and all the kings gathered there are eternal men.  It is not that in the past they did not exist separately in the form of beings and it is not that these eternal Purushas will not remain.  They existed in the past and will continue to exist uninterruptedly in the future.  So there is nothing to grieve for anyone.

 Describing the definition of religion in the Gita through the Bhagavad Gita, Shri Krishna says that after the liberation of this illusionistic principle, the soul will be separated from the veil of Maya and merge into the formless Brahman and lose its existence.  Here the supreme authority is not substantiated by Lord Krishna, nor is it supported by the theory that it is only in the state that we contemplate existence.  Here, Krishna clearly states that the existence of God and others will remain intact in future also, which is confirmed by the Upanishads also.  This statement of Krishna is authentic because Krishna is not Maya Vasya.  If existence was not a fact then why would Krishna give so much strength and that too for the future.

 Māyāvāds may argue that the existence perceived by Ka is material, not spiritual.  Even if we accept the argument that existence is material, then how can one recognize the existence of Krishna?  Krishna confirms his existence in the past and confirms his existence in the future also.  Krishna always maintains his existence forever.  If he is regarded as an ordinary person with normal consciousness, then his Bhagavad Gita will have no significance as an authentic scripture.  An ordinary person is unable to give an listening education because of the four demerits of human beings.  The Gita is above such literature.  No worldly book can compare to the Gita.

 If Shri Krishna is considered as an ordinary person, all the importance of the Gita goes away.  Maya litigants argue that the duality described in this verse is temporal and applied to the body.  It is mentioned at many places in the Gita that this spiritual existence is observable only by the devotees of the Lord, those who oppose Lord Krishna have no access to this great literature.  The characters are like licking.  Honey cannot be tasted without opening the vessel.  Similarly, only the devotees can understand the mysticism of the Bhagavad Gita and no one else.  Therefore, the interpretation of the Gita by the Mayavadis as if is a sheer illusory representation of the whole truth.

 Lord Caitanya forbade the reading of the interpretations of the Gita by the Maya litigants.  And warned that anyone who takes such Mayawati Darshan is unable to understand the real secret of the Gita.  If existence meant the empirical universe, then there was no need for the Lord to preach.  The duality of the soul and the Supreme is an eternal fact and is confirmed by the Vedas as has been said above.

 Hail Hail Lord Radhe

 Greetings

 Annapoorna Sharma

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

अर्जुन का शोक मग्न होना

 अर्जुन का शोक मगन होना --- संजय ने कहा कि इस प्रकार कहने के बाद शत्रुओ का दमन करने वाला अर्जुन कृष्ण से बोला , हे गोविंद! मैं युद्ध नहीं करूंगा ,और चुप हो गया ।  हे भारतवंशी (धृतराष्ट्र )उस समय दोनों सेनाओं के मध्य शोक मग्न अर्जुन से कृष्ण ने मानो हंसते हुए यह शब्द कहे । श्री भगवान ने कहा --- तुम पांडित्य पूर्ण वचन कहते हुए उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं है। जो विद्वान होते हैं, वह ना तो जीवित के लिए ,ना ही मृत के लिए शोक करते हैं ।

    श्लोक का सार ---‐ श्रीमद भगवत गीता के अध्याय 2 के श्लोक  9 ,10 ,11 में धृतराष्ट्र को यह जानकर प्रसन्नता हुई होगी कि अर्जुन युद्ध ना करके युद्ध भूमि छोड़कर भिक्षाटन  करने जा रहा है, किंतु संजय ने 9 वे श्लोक में यह कहते हुए धृतराष्ट्र को निराश कर दिया कि अर्जुन अपने शत्रु को मारने में सक्षम है । यद्यपि कुछ समय के लिए अर्जुन अपने पारिवारिक स्नेह  के प्रति मिथ्या शोक से अभिभूत था ,  किंतु उसने शिष्य रूप में अपने गुरु श्री कृष्ण की शरण ग्रहण कर ली  । इससे सूचित होता है कि शीघ्र ही वह इस शोक से निवृत हो जाएगा और आत्म साक्षात्कार या कृष्ण भावना मृत के पूर्ण ज्ञान से प्रकाशित होकर पुन: युद्ध करेगा। इस तरह धृतराष्ट्र  का हर्ष भंग हो जाएगा ।

             दो घनिष्ठ मित्रों अर्थात ऋषिकेश तथा गुड़ाकेश के मध्य वार्ता चल रही थी  । मित्र के रुप में दोनों का पद समान था  , किंतु इनमें से एक स्वेच्छा से दूसरे का शिष्य बन गया  । कृष्ण हंस रहे थे क्योंकि उनका मित्र अब उनका शिष्य बन गया था  । सबो के स्वामी होने के कारण वे सदैव श्रेष्ठ पद पर रहते हैं । तो भी भगवान अपने भक्तों के लिए सखा ,  पुत्र ,  या प्रेमी बनना स्वीकार करते हैं  । भगवान कभी भी अपने भक्तों पर अत्याचार या उन्हें दुखी नहीं देख सकते ।  इस संदर्भ में एक संत की कहानी याद आ रही है वह मद - मस्त मस्ती में भगवान में ही रमा रहता था  । तो आइए इस कहानी को इस संदर्भ में देखते हैं कि भगवान अपने शिष्य या भक्तों का अपमान कैसे नहीं भूलते और उन्हें किस तरह अपनी शरण में ले लेते हैं ।

    कहानी  ---- एक साधु वर्षा के जल में प्रेम और मस्ती से भरा चला जा रहा था  , कि उसने एक मिठाई की दुकान को देखा जहां एक कढ़ाई में गर्म दूध उबल रहा था तो दूसरी कढ़ाई में गरमा गरम जलेबी उतर रही थी ।साधु कुछ क्षणों के लिए रुका क्योंकि उसे भूख का एहसास हो रहा था लेकिन उसके पास पैसे नहीं थे कि  वे कुछ खरीद कर  खा सके  । वह  भट्टी के पास आया और भट्टी को देखकर उसने ऊपर आसमान की तरफ देखा और थोड़ी गर्मी लेकर वहां से जाने लगा  । लेकिन दुकान का मालिक जान गया था कि साधु भूखा है। उसने प्याला भर कर दूध और कुछ जलेबियां उस साधु को खाने को दी।  साधु प्रसन्न होते हुए ऊपर की तरफ देखते हुए उसने दूध और जलेबी का आनंद लिया और भगवान से उस दुकान के मालिक के लिए प्रार्थना की और आगे चल दिया ।  साधु बाबा भगवान की मस्ती में दुनिया के दुखों से बेपरवाह नए जोर  से बारिश के गदले पानी के छींटे उड़ाता चला जा रहा था ।

           उसके पीछे एक नवविवाहिता जोड़ा आ रहा था लेकिन उसे इस बात की भनक नहीं थी ।  वह भगवान में मस्त चला जा रहा था , नाचता  गाता  पानी उछालता । तभी बारिश का पानी उड़ता हुआ सीधा पीछे आने वाली नवविवाहिता युवती के  कपड़ों को भिगों गया और उस औरत के कीमती कपड़े कीचड़ से लथपथ हो गए ।  उसके पति को यह बर्दाश्त नहीं हुआ इसलिए वह आस्तीन चढ़ाकर आगे बढ़ा और साधु के कपड़ों को पकड़ कर खींच कर कहने लगा --" अंधा है तुमको नजर नहीं आता , तेरी हरकत की वजह से मेरी पत्नी के कपड़े गीले हो गए हैं और कीचड़ से भर गए हैं ।

           साधु हक्का-बक्का सा खड़ा था जबकि इस युवा को साधु का चुप रहना ना खुशगवार गुजर रहा था ।  महिला ने आगे बढ़कर अपने पति से साधु को छुड़वाना चाहा लेकिन उसके गुस्से से डरकर वह भी पीछे हट गई ।  वहां पर खड़े लोग भी उस आदमी के गुस्से को देखकर साधु को छुड़ा ना सके  । उस युवक ने साधु को इतना मारा कि वह नीचे धड़ाम से गिर गया  । युवक मुस्कुराता हुआ आगे बढ़ गया और साधु आकाश की ओर देखने लगा और उसके होठों से निकला वह मेरे भगवान कभी गर्म दूध जलेबियां और कभी गर्म थप्पड़ लेकिन जो तू चाहे मुझे भी वही पसंद है ।

      साधु वापस उठा और भगवान को याद करने लगा ।  और वे नवविवाहित जोड़ा थोड़ी दूर जाने के बाद अपने घर जा पहुंचे  । वह युवक अपने घर की चाबी जेब से निकालता हुआ आगे बढ़ा क्योंकि उसका घर पहली मंजिल पर था  । बारिश की वजह से वह पूरा गीला हो चुका था ।  बड़ा ही संभलकर वह सीढियों  में चल रहा था अपनी पत्नी से बात करते हुए  । तभी अचानक उसका पैर फिसला और वह सीढ़ियों से गिरता  हुआ  नीचे आ गिरा  । महिला जोर-जोर से चिल्लाने लगी तभी वहां पर भीड़ इकट्ठी हो गई  । वहां उस युवा का सर फट  चुका था  । बहुत खून बह रहा था और पास जाकर देखा तो वह मर चुका था  । कुछ लोगों ने दूर से आते हुए उस साधु बाबा को देखा तो आपस में बात करने लगे कि साधु का श्राप लगा है इस युवा को तभी तो मर गया नहीं तू इतने से गिरने में भला कोई मरता है क्या ?  कुछ लोगों ने साधु से कहा कि  -- "आप कैसे भगवान के भक्त हैं, जो केवल मारपीट करने के कारण युवा को श्राप दे बैठे ।  भगवान के भक्तों में रोड व  गुस्सा हरगिज़ नहीं होता  । आप तो जरा सी असुविधा पर भी धैर्य न कर सके "।

         साधु बाबा कहने लगा ----- भगवान की कसम मैंने इस युवा को श्राप नहीं दिया  । यह सब भगवान की माया है ।  तब साधु बाबा ने वहां खड़े लोगों से पूछा कि सारे घटनाक्रम को शुरू से अंत तक किसने देखा है  ? एक युवक ने आगे बढ़कर कहा कि मैंने यह सब घटना देखी है  । साधु अगला सवाल क्या मेरे कदमों से जो कीचड़ उछला था क्या उसने युवा के कपड़े गंदे किए थे  ? उसने कहा नहीं, लेकिन महिला के कपड़े गंदे जरूर किए थे  । साधु ने उस युवक की बाहों को थामते हुए पूछा फिर युवा ने मुझे क्यों मारा  ? युवक ने कहा क्योंकि वे उस महिला का पति था और  वह यह बर्दाश्त नहीं कर सका कि कोई उसके प्रेमी के कपड़ों को गंदा करे ।  इसलिए उस युवक ने आप को मारा  । युवा की बात सुनकर साधु जोर से ठहाका मारकर हंसा और  यह कहता हुआ आगे बढ़ता चला गया कि  *तो भगवान की कसम मैंने श्राप कभी किसी को नहीं दिया, लेकिन कोई है जो मुझ से प्रेम रखता है ।  अगर उसका यार सहन नहीं कर सका तो मेरे यार को कैसे बर्दाश्त होगा कि कोई मुझे मारे और वह मेरा यार इतना शक्तिशाली है कि दुनिया का बड़े से बड़ा राजा भी उसकी लाठी से डरता है ।

         इसी प्रकार जब अर्जुन अपने कर्तव्य से विमुख हो रहा है ,शोक  मग्न हो रहा है ।  तब कृष्ण ने शिष्य रूप में अर्जुन को अंगीकार कर लिया और तुरंत गुरु की भूमिका निभाने के लिए शिष्य से गुरु की भांति गंभीरता पूर्वक बातें की जैसा कि अपेक्षित है  । ऐसा प्रतीत होता है कि गुरु तथा शिष्य की यह वार्ता दोनों सेनाओं की उपस्थिति में हुई जिससे सारे लोग लाभान्वित हुए ।  आत: भगवत गीता का संवाद किसी एक व्यक्ति ,  समाज या जाति के लिए नहीं अपितु सबों के लिए है और उसे सुनने के लिए शत्रु या  मित्र समान रूप से अधिकारी है ।

         भगवान ने तत्काल गुरु का पद संभाला और अपने शिष्य को अप्रत्यक्षत:  मूर्ख कहकर डांटा  । उन्होंने कहा ---" तुम विद्वान की तरह बातें करते हो किंतु तुम यह नहीं जानते कि जो विद्वान होता है -- अर्थात जो यह जानता है कि शरीर तथा आत्मा क्या है ?  वह किसी भी अवस्था में शरीर के लिए चाहे वह जीवित हो या मृत शोक नहीं करता  "। अर्जु



न का तर्क था कि राजनीति या सामाजिक नीति की अपेक्षा धर्म को अधिक महत्व मिलना चाहिए ,किंतु उसे यह ज्ञात न था कि पदार्थ ,आत्मा तथा परमेश्वर का ज्ञान धार्मिक सूत्रों से भी अधिक महत्वपूर्ण है और चूँकि उसमें इन ज्ञान का अभाव था,  अतः उसे विद्वान नहीं बनना चाहिए था और चूँकि वह अत्यधिक विद्वान नहीं था इसलिए शोक के सर्वथा अयोग्य वस्तु के लिए शोक  कर रहा था ।

       यह शरीर जन्मता है और आज या कल इसका विनाश निश्चित है अतः शरीर उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना की आत्मा है ।  जो तथ्य को जानता है वही असली विद्वान है और उसके लिए शोक का कोई कारण नहीं हो सकता ।

                                जय जय श्री राधे

                                                              प्रणाम

                                                      अन्नपूर्णा शर्मा

अर्जुन

English Translation

Title - Arjuna's grief

Arjuna's mourning --- Sanjay said that after saying this, Arjuna, who suppressed the enemies, said to Krishna, O Govind! I will not fight, and fell silent. O descendant of India (Dhritarashtra), at that time Krishna said these words to Arjuna, who was mourning between the two armies, laughing. Shri Bhagwan said --- You are mourning for those who are not worthy of mourning by saying erudite words. Those who are learned, neither grieve for the living nor for the dead.

    Summary of the verse ---‐ In Shlok 9, 10, 11 of Adhyay 2 of Shrimad Bhagavad Gita, Dhritarashtra must have been happy to know that Arjuna is leaving the battlefield and going to beg for alms, but Sanjaya said this in the 9th verse. Disappointed Dhritarashtra by saying that Arjuna was capable of killing his enemy. Although for some time Arjuna was overwhelmed by false grief for his family affection, he took refuge in his guru Sri Krishna as a disciple. This indicates that soon he will be retired from this grief and will fight again after being illuminated by self-realization or full knowledge of Krishna consciousness of the dead. In this way the joy of Dhritarashtra will be disturbed.

             Talks were going on between two close friends namely Rishikesh and Gudakesh. As friends, both had equal status, but one of them voluntarily became a disciple of the other. Krishna was laughing because his friend had now become his disciple. Being the lord of all, he always remains in the highest position. Yet the Lord accepts to be a friend, son, or lover to His devotees. The Lord can never see His devotees oppressed or saddened. In this context, the story of a saint is remembered, he used to live in God only in mad-mast fun. So let us see this story in the context of how the Lord does not forget the insult of His disciple or devotees and takes them in His refuge.

    Story ---- A monk was walking full of love and fun in the rain water, that he saw a sweet shop where hot milk was boiling in one pan and hot jalebi was coming down in the other pan. He stayed for a few moments because he was feeling hungry but he did not have money to buy something and eat. He came near the furnace and seeing the furnace, he looked up at the sky and started leaving from there after taking some heat. But the owner of the shop had come to know that the monk was hungry. He filled the cup and gave milk and some jalebis to the monk to eat. Looking upwards, the sadhu was pleased, he enjoyed the milk and jalebi and prayed to God for the owner of that shop and went ahead. Sadhu Baba, in the fun of God, was going on splashing water with a new loudness, regardless of the sorrows of the world.

           A newly married couple was coming behind him but he was not aware of this. He was going crazy in God, dancing, singing and throwing water. Just then, the rain water soaked the clothes of the newly married woman who came straight behind and the precious clothes of that woman got soaked with mud. Her husband could not tolerate this, so he went ahead with his sleeves up and grabbed the monk's clothes and started pulling and said - "You are blind, you do not see, because of your actions, my wife's clothes have become wet and with mud." have been filled.

           The sage stood stunned while this young man was not happy to remain silent. The woman went ahead and tried to get the sadhu released from her husband, but fearing his anger, she also backed down. Even the people standing there could not get rid of the sadhu after seeing that man's anger. The young man hit the monk so much that he fell down with a rage. The young man went ahead smiling and the monk started looking at the sky and came out of his lips that my God sometimes hot milk jalebis and sometimes hot slaps but whatever you want, I also like the same.

      The monk got back up and started remembering the Lord. And the newly wed couple after going a short distance reached their home. The young man proceeded taking the keys of his house out of his pocket as his house was on the first floor. It was completely wet because of the rain. Very carefully he was walking in the stairs while talking to his wife. Then suddenly his foot slipped and he fell down the stairs. The woman started shouting loudly when a crowd gathered there. There the young man's head had exploded. He was bleeding profusely and when he looked near, he was dead. When some people saw that sadhu baba coming from afar, then they started talking among themselves that the sadhu has been cursed, this young man has not died only then, does anyone die in falling so much? Some people said to the monk that - "How are you a devotee of God, who cursed the youth only because of beatings. There is no road and anger among the devotees of God. You should not be patient even on the slightest inconvenience. could".

         Sadhu Baba started saying ----- I have not cursed this young man by the oath of God. All this is the illusion of God. Then Sadhu Baba asked the people standing there that who has seen all the events from beginning to end? A young man went ahead and said that I have seen all this incident. Sage Next question Did the mud that sprung from my feet dirty the young man's clothes? He said no, but the woman's clothes must have been dirty. Holding the arms of the young man, the monk asked, then why did the young man hit me? The young man said because he was the husband of the woman and he could not tolerate that someone would dirty his lover's clothes. That's why that young man killed you. Hearing the words of the young man, the monk laughed out loud and went on saying that * so I never cursed God to anyone, but there is someone who loves me. If his friend could not bear it then how would my friend tolerate that someone kills me and that my friend is so powerful that even the biggest king of the world is afraid of his stick.

         Similarly, when Arjuna is deviating from his duty, he is in mourning. Krishna then accepted Arjuna as his disciple and immediately spoke to the disciple as seriously as a guru to assume the role of guru. It seems that this conversation between the Guru and the disciple took place in the presence of both the armies, which benefited all the people. Therefore, the dialogue of Bhagavad Gita is not for any one person, society or caste but for all and the enemy or friend is equally entitled to hear it.

         The Lord immediately assumed the position of Guru and reprimanded His disciple indirectly by calling him a fool. He said--"You talk like a scholar but you do not know that one who is a scholar--that is, one who knows what the body and soul are? He is in any condition for the body, whether it is alive or not. The dead do not grieve. Arju


Ne argued that religion should be given more importance than politics or social policy, but he did not know that the knowledge of matter, soul and God is more important than religious sources and since he lacked these knowledge, so he Should not have become a scholar, and since he was not very learned, he was mourning for something completely unworthy of mourning.

       This body is born and its destruction is certain today or tomorrow, so the body is not as important as the soul. He who knows the facts is the real scholar and there can be no reason for him to grieve.

                                Hail Hail Lord Radhe

                                                              Greetings

                                                      Annapurna Sharma

रविवार, 12 दिसंबर 2021

अर्जुन कृष्ण की शरण में


 अर्जुन कृष्ण की शरण में --- मुझे ऐसा कोई साधन नहीं दिखता जो मेरी इंद्रियों को सुखाने वाले इस शौक को दूर कर सके। स्वर्ग पर देवताओं के आधिपत्य की तरह इस धन-धान्य से संपन्न सारी पृथ्वी पर निश कंटक राज्य प्राप्त करके भी मैं इस शौक को दूर नहीं कर सकूंगा ।

    श्लोक का सार  ---श्रीमद भगवत गीता के अध्याय 2 के श्लोक 8 में अर्जुन धर्म तथा सदाचार के नियमों पर आधारित अनेक तर्क प्रस्तुत करता है ,किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने गुरु भगवान श्री कृष्ण की सहायता के बिना अपनी असली समस्याओं को हल नहीं कर पा रहा ।

          भगवान चैतन्य ने कहा है कि जो कृष्ण भावनामृत के विज्ञान में दक्ष हो, कृष्ण तत्ववेत्ता  हो ,चाहे वह जिस किसी जाति का हो, वही वास्तविक गुरु है --"कोई व्यक्ति चाहे वह विप्र (वैदिक ज्ञान में दक्ष )हो ,निम्न जाति में जन्मा शूद्र हो या की सन्यासी ।यदि कृष्ण के विज्ञान में दक्ष (कृष्ण तत्व वेता )है तो वह यथार्थ प्रमाणिक गुरु है ।"

     अतः कृष्ण तत्व वेत्ता हुई बिना कोई भी प्रामाणिक गुरु नहीं हो सकता ।

    वैदिक साहित्य के पद्म पुराण में भी कहा गया है----" विद्वान ब्राह्मण भले ही वह संपूर्ण वैदिक ज्ञान में पारंगत क्यों ना हो यदि वह वैष्णव नहीं है या कृष्ण भावनामृत में दक्ष नहीं है तो गुरु बनने का पात्र नहीं है ,किंतु शूद्र यदि  वैष्णव या कृष्ण भक्त है तो गुरु बन सकता है  ।" (पद्म पुराण )

        वह समझ गया था कि उसका तथाकथित ज्ञान उसकी उन समस्याओं को दूर करने में व्यर्थ है जो उसके सारे अस्तित्व  (शरीर) को सुखाए दे रही थी  ।उसे इन उलझनों को भगवान कृष्ण जैसे आध्यात्मिक गुरु की सहायता के बिना हल कर पाना असंभव लग रहा था । शैक्षिक ज्ञान, विद्ता, उच्च पद यह सब जीवन की समस्याओं का हल करने में व्यर्थ है  ।यदि कोई इसमें सहायता कर सकता है तो वह है एकमात्र गुरु ।

         इस श्लोक के सार को हम एक कहानी द्वारा भी समझ सकते हैं ।मृत्यु अटल है ,कर्म का सिद्धांत अटल है और कर्मों का फल हमें जीवन में भोगना ही पड़ता है। तो कहानी इस प्रकार है---

       कहानी-- एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु गरुड़ पर बैठकर कैलाश पर्वत पर गए।  द्वार पर गरुड़ को छोड़कर श्रीहरि खुद शिव से मिलने अंदर चले गए ।तब कैलाश की प्राकृतिक शोभा को देखकर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे, कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी चिड़िया पर पड़ी चिड़िया इतनी सुंदर थी कि गरूड के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे ।उसी समय कैलाश पर यमदेव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की दृष्टि से देखा। गरूड समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएंगे ।

       गरुड़ को दया आ गई । इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे । उसे अपने पंजों में दबाया और कैलाश से हजारों कोस दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया और खुद वापस कैलाश पर आ गए  ।आखिर जब यम बाहर आए तो गरूड ने पूछ लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों देखा था  ।यमदेव बोले  --" गरूड जो मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वह चिड़िया कुछ ही पल बाद यहां से हजारों कोस दूर एक नागद्वारा खाली जाएगी । मैं सोच रहा था कि वह इतनी जल्दी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर अब जब वह यहां नहीं है तो निश्चित ही वह मर चुकी होगी। गरूड समझ गए मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए ।"

        संसार की समस्याओं  ----  जन्म ,जरा ,व्याधि तथा मृत्यु की निवृत्ति ,धन संचय तथा आर्थिक विकास से संभव नहीं है  । विश्व के विभिन्न भागों में ऐसे राज्य हैं जो जीवन की सारी सुविधाओं तथा संपत्ति एवं आर्थिक विकास से पूरित है, किंतु फिर भी उनके सांसारिक जीवन की समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई है ।  वह विभिन्न साधनों से शांति खोजते हैं किंतु वास्तविक सुख उन्हें तभी मिल पाता है जब कृष्ण भावनामृत  से युक्त कृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधि के माध्यम से कृष्ण अथवा कृष्ण तत्व पूरक भगवत गीता तथा श्रीमद्भागवत के परामर्श को ग्रहण करते हैं ।

         यदि आर्थिक विकास तथा भौतिक सुख किसी के पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से उत्पन्न हुए शोको को दूर कर पाते, तो अर्जुन यह ना कहता कि पृथ्वी का अप्रतिम राज्य या स्वर्ग लोक में देवताओं की सर्वोच्चता भी उसके शोको को दूर नहीं कर सकती ।इसलिए उसने कृष्ण भावना मृत का ही आश्रय  ग्रहण किया और यही शांति तथा समरसता का उचित मार्ग है ।  आर्थिक विकास या विश्व आधिपत्य प्राकृतिक प्रलय द्वारा किसी भी क्षण समाप्त हो सकता है  । यहां तक कि चंद्रलोक जैसे उच्च लोको की यात्रा भी जिसके लिए मनुष्य प्रयत्नशील है एक झटके में समाप्त हो सकती है ।

         भगवत गीता इसकी पुष्टि करती है  ---  जब पुण्य कर्मों के फल समाप्त हो जाते हैं तो मनुष्य सुख के शिखर से जीवन के निम्न स्तर पर गिर जाता है । इस तरह से की अनेक राजनीतिज्ञो  का पतन हुआ है  । ऐसा अध:पतन शोक का कारण बनता है  । अतः निष्कर्ष यह निकला कि गुरु जो शत-प्रतिशत कृष्ण भावना भावित होता है, वही एकमात्र प्रामाणिक गुरु है और यही जीवन की समस्याओं को हल कर सकता है । 

        अतः यदि हम सदा के लिए शोक का निवारण चाहते हैं तो हमें कृष्ण की शरण ग्रहण करनी होगी जिस तरह अर्जुन ने की  । अर्जुन ने कृष्ण से प्रार्थना की कि वे उसकी समस्या का निश्चित समाधान कर दें और यही कृष्ण भावना मृत की विधि है ।

        इसलिए कृष्ण कहते हैं  -- " करता तू वह है, जो तू चाहता है परंतु होता वह है ,जो मैं चाहता हूं, कर तू वह जो मैं चाहता हूं फिर होगा वह जो तू चाहेगा ।"

                         जय जय श्री राधे

                                                          प्रणाम

                                               अन्नपूर्णा शर्मा

arjuna

English Translation 

Title- Arjun in the shelter of Krishna

Arjuna in the shelter of Krishna---I do not see any means which can remove this passion which is drying up my senses. I will not be able to overcome this hobby even after attaining the kingdom of Kantak in this rich and prosperous whole earth like the dominion of the gods over heaven.


    Summary of the verse --- In Shlok 8 of Adhyay 2 of Shrimad Bhagavad Gita, Arjuna presents many arguments based on the rules of Dharma and Virtue, but it seems that he can solve his real problems without the help of his Guru Lord Shri Krishna. unable to solve


          Lord Caitanya has said that one who is proficient in the science of Krishna consciousness, who is a Krishna Tatvatva, whatever caste he belongs to, he is the real guru -- "Anyone whether he is a Vipra (proficient in Vedic knowledge), in the lower caste Born Shudra or Sanyasi. If one is proficient in the science of Krishna (Krishna Tattva Veta), then he is a real authentic guru."


     Therefore one cannot be an authentic guru without becoming a Krishna Tattva Vetta.


    It is also said in Padma Purana of Vedic literature----"The learned brahmin, even though he may be proficient in all Vedic knowledge, is not eligible to become a guru if he is not a Vaishnava or is not proficient in Krishna consciousness, but a Shudra One can become a guru if one is a Vaishnava or a Krishna devotee." (Padma Purana)


        He understood that his so-called knowledge was in vain in solving the problems that were drying up his whole being (body). He found it impossible to solve these problems without the help of a spiritual master like Lord Krishna. . Educational knowledge, wisdom, high status all these are useless in solving the problems of life. If anyone can help in this, it is the only Guru.


         We can also understand the essence of this verse through a story. Death is immutable, the principle of karma is unshakable and we have to bear the fruits of our actions in life. So the story goes like this--


       Story - According to a legend, Lord Vishnu sat on Garuda and went to Mount Kailash. Leaving Garuda at the door, Shri Hari himself went inside to meet Shiva. Then Garuda was mesmerized by the natural beauty of Kailash, that when his eyes fell on a beautiful little bird, the bird was so beautiful that all the thoughts of Garuda started getting attracted towards him. At the same time, Yamdev came to Kailash and before going inside, he looked at that little bird in surprise. Garuda understood that the end of that bird is near and Yamdev will take it with him to Yamlok as soon as it leaves Kailash.


       Garuda felt pity. Couldn't see such a small and beautiful bird dying. Tucked it in his claws and left it on a rock in a forest thousands of kos away from Kailash and came back to Kailash himself. When Yama finally came out, Garuda asked why he looked at the bird with such amazement. Yamdev said - "Garuda, who I saw that bird, I came to know that after a few moments that bird will be empty by a snake thousands of kos away from here. I was wondering how it will go so far so soon, but now When she is not here, she must be dead.


        Retirement of the world's problems---birth, death, illness and death, is not possible by accumulation of wealth and economic development. There are states in different parts of the world which are full of all the facilities of life and wealth and economic development, but still the problems of their worldly life remain the same. He seeks peace by various means, but real happiness comes to him only when, through an authentic representative of Krishna in Krsna consciousness, Krishna or the Krishna element takes the advice of the supplementary Bhagavad Gita and Srimad Bhagavatam.


         If economic development and material happiness could remove one's sorrows arising out of family, social, national and international order, then Arjuna would not say that even the splendid kingdom of the earth or the supremacy of the gods in the heavenly world could not remove one's sorrows. Therefore he took shelter of the dead Krishna consciousness and this is the proper path to peace and harmony. Economic development or world domination can be ended at any moment by natural cataclysm. Even the journey to higher realms like Chandraloka for which man is striving can end in a jiffy.


         The Bhagavad Gita confirms this --- When the fruits of virtuous actions are exhausted, then man falls from the pinnacle of happiness to the lowest level of life. In this way many politicians have fallen. Such degeneration causes grief. Hence the conclusion is reached that the guru who is 100% Krsna conscious is the only authentic guru and he can solve the problems of life.


        So if we want to get rid of grief forever, we have to take refuge in Krsna, as Arjuna did. Arjuna prayed to Krsna to give a definite solution to his problem and this is the method of Krsna consciousness dead.


        That's why Krishna says - "Do what you want, but be what you want, do what I want, then you will be whatever you want."


                         Hail Hail Lord Radhe


                                                          Greetings


                                               Annapurna Sharma

      

बुधवार, 8 दिसंबर 2021

अध्याय 2 गीता का सार

 श्लोक एक और दो.  ---- यह अध्याय हमें भौतिक शरीर तथा आत्मा के वैश्लेषिक अध्ययन द्वारा आत्म साक्षात्कार का उपदेश देता है ,जिसकी व्याख्या परम अधिकारी भगवान कृष्ण द्वारा की गई है ।यह साक्षात्कार तभी संभव है जब मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करें और आत्मबोध को प्राप्त हो ।अतः कृष्ण आदि भगवान परम सत्य ,परमात्मा तथा निर विशेष ब्रह्मा दोनों के उद्गम हैं ।

    कृष्ण ने अर्जुन से कहा  ---करुणा से व्याप्त शोक युक्त अश्रुपूरित नेत्रों वाले अर्जुन को देखकर मधुसूदन कृष्ण ने यह शब्द कहे। श्री भगवान ने कहा --हे अर्जुन !तुम्हारे मन में यह कल्मष  आया कैसे ?यह उस मनुष्य के लिए तनिक भी अनुकूल नहीं है जो जीवन के मूल्य को जानता हो । इससे उच्च लोक की नहीं अपितु अपयश की प्राप्ति होती है ।

     श्लोक का सार  ---श्रीमद भगवत गीता के अध्याय 2 के श्लोक 1 और 2 में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को समझाया जा रहा है कि अपने भौतिक पदार्थों के प्रति करुणा ,शोक तथा अश्रु -- ये सब असली आत्मा को न जानने के लक्षण है ।शाश्वत आत्मा के प्रति करुणा ही आत्म- साक्षात्कार है ।इस श्लोक में "मधुसूदन "शब्द महत्वपूर्ण है ।कृष्ण ने मधु नामक असुर का वध किया था और अब अर्जुन चाह रहा है कि कृष्ण उस अज्ञान रूपी असुर का वध करें जिसने उसे कर्तव्य से विमुख कर रखा है। यह कोई नहीं जानता कि करुणा का प्रयोग कहां होना चाहिए डूबते हुए मनुष्य के वस्त्रों के लिए करुणा मूर्खता होगी, अज्ञान सागर में गिरे हुए मनुष्य को केवल उसके बाहरी पहनावे अर्थात स्थूल शरीर की रक्षा करके नहीं बचाया जा सकता ।जो इसे नहीं जानता और बाहरी पहनावे के लिए जो करता है वह शूद्र कहलाता है अर्थात वह व्रथा  ही शौक करता है। अर्जुन तो क्षत्रिय था ,अत:  उससे ऐसे आचरण की आशा न थी, किंतु भगवान कृष्णा ज्ञानी पुरुष के शौक को विनष्ट  कर  सकते हैं और इसी उद्देश्य से उन्होंने भगवत गीता का उपदेश दिया।

              श्री कृष्ण तथा भगवान अभिन्न है ,इसीलिए श्री कृष्ण को संपूर्ण गीता में भगवान ही कहा गया है । भगवान परम सत्य की पराकाष्ठा है ।परम सत्य का बोध ज्ञान की तीन अवस्थाओं में होता है -- ब्रह्मा या निर्विशेष सर्वव्यापी चेतना ,परमात्मा या भगवान का अंतर्यामी रूप जो समस्त जीवो के हृदय में है तथा भगवान  या श्री भगवान कृष्ण। श्रीमद्भागवत में परम सत्य की धारणा इस प्रकार बताई गई है  ---"परम सत्य का ज्ञाता परम सत्य का अनुभव ज्ञान की तीन अवस्थाओं में करता है ,और यह सब अवस्थाएं एक रूप है ।यह ब्रह्मा ,परमात्मा तथा भगवान के रूप में व्यक्त की जाती है।"

         इन तीन दिव्य पक्षों को सूर्य के दृष्टांत द्वारा समझाया जा सकता है क्योंकि उसके भी 3 भिन्न -भिन्न पक्ष होते हैं ---यथा ,धूप (प्रकाश ),सूर्य की सतह तथा सूर्य लोक स्वयं ।जो सूर्य के प्रकश का अध्ययन करता है वह नौसिखिया है। जो सूर्य के सतह को समझता है वह कुछ आगे बढ़ा हुआ होता है ।और जो सूर्य लोक में प्रवेश कर सकता है वह उच्चतम ज्ञानी है ।जो नौसिखिया सूर्यप्रकाश --उसकी विश्वव्याप्ति तथा उसकी निर्विशेष  प्रकृति  के अखंड तेज --के ज्ञान से ही तुष्ट हो जाता है।वह  उस व्यक्ति के समान है जो परम सत्य के बाहरी  रूप को ही समझ सकता है। जो व्यक्ति कुछ अधिक जानकार है वह  सूर्य गोले के विषय में जान सकता है जिसकी तुलना परम सत्य के परमात्मा स्वरुप से की जाती है। जो व्यक्ति सूर्यलोक के अंतर में प्रवेश कर सकता है उसकी तुलना उस से की जाती है जो परम सत्य के साक्षात रुप की अनुभूति प्राप्त करता है। अतः जिन भक्तों ने परम सत्य के भगवान स्वरूप का साक्षात्कार किया है वे सर्वोच्च अध्यात्म वादी हैं ,यद्यपि परम सत्य के अध्ययन में रत सारे विद्यार्थी एक ही विषय के अध्ययन में लगे हुए हैं ।सूर्य का प्रकाश सूर्य का गोला तथा सूर्य लोक की भीतरी बातें--- इन तीनों को एक दूसरे से विलग नहीं किया जा सकता ,फिर भी तीनों अवस्थाओं के अध्येता एक ही श्रेणी के नहीं होते।

           संस्कृत शब्द "भगवान "की व्याख्या व्यास देव के पिता पराशर मुनि ने की है। समस्त धन, शक्ति ,यश ,सौंदर्य ,ज्ञान तथा त्याग से युक्त परम पुरुष भगवान कहलाता है ।ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो अत्यंत धनी हैं, अत्यंत शक्तिमान है ,अत्यंत सुंदर है और अत्यंत विख्यात विद्वान तथा विरक्त भी हैं किंतु कोई साधिकार यह नहीं कह सकता कि उसके पास सारा धन ,शक्ति आदि है। एकमात्र कृष्ण  ही ऐसा दावा कर सकते हैं क्योंकि वह भगवान है। ब्रह्मा ,शिव या नारायण सहित कोई भी जीव कृष्ण के समान पूर्ण ऐश्वर्यवान नहीं है ।अतः ब्रम्ह संहिता मे स्वयं ब्रह्मा जी का निर्णय है कि श्री कृष्ण स्वयं भगवान है। ना तो कोई उनके तुल्य है ना उन से बढ़कर है । वे आदी स्वामी या भगवान है ,गोविंद रूप मैं जाने जाते हैं और समस्त कारणों के प्रमुख कारण हैं ---"ऐसे अनेक पुरुष है जो भगवान के गुणों से युक्त हैं ,किंतु कृष्ण परम है क्योंकि उन से बढ़कर कोई नहीं है ।वे परम पुरुष हैं और उनका शरीर सच्चिदानंदमय  है ।वह आदी भगवान गोविंद है और समस्त कारणों के कारण हैं।"

                                                            (  ब्रह्म संहिता  5 ;1)

           भागवत ने भी भगवान के नाना अवतारों की सूची है ,किंतु कृष्ण को आदि भगवान बताया गया है ,जिनसे अनेकानेक अवतार तथा ईश्वर विस्तार करते हैं ---" यहां पर वर्णित सारे अवतारों की सूचियां या तो भगवान की अंशकलाओं अथवा पूर्ण कलाओं की है ,किंतु कृष्ण तो स्वयं भगवान है।"      ( भागवत)

          भगवान की उपस्थिति में अर्जुन द्वारा स्वजनों के लिए शोक करना सर्वथा अशोभनीय है। अतः कृष्ण ने कुत्त: शब्द से अपना आश्चर्य व्यक्त कि
या है ।आर्य जैसे सभ्य जाति के किसी व्यक्ति से ऐसी मलिनता की उम्मीद नहीं की जाती ।आर्य शब्द उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो जीवन के मूल्य को जानते हैं और जिनकी सभ्यता, आत्म-साक्षात्कार पर निर्भर करती है ।देहात्मबुद्धि से प्रेरित मनुष्यों को यह ज्ञान नहीं रहता कि जीवन का उद्देश्य परम सत्य ,विष्णु  या भगवान का साक्षात्कार है ।वे तो भौतिक जगत के ब्रह्म स्वरूप से मोहित हो जाते हैं ,अतः वे यह नहीं समझ पाते कि मुक्ति क्या है ?जिन पुरुषों को भौतिक बंधन से मुक्ति का कोई ज्ञान नहीं होता वह अनार्य कहलाते हैं।

          यद्यपि अर्जुन क्षत्रिय था, किंतु युद्ध से विचलित होकर वह अपने कर्तव्य से गुमराह हो रहा था ।उसकी यह कायरता अनार्योके लिए ही शोभा देने वाली हो सकती है ।कर्तव्य -पथ से इस प्रकार का विचलन न तो आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने में सहायक बनता है ना ही इससे इस संसार में ख्याति प्राप्त की जा सकती है ।भगवान कृष्ण ने अर्जुन द्वारा अपने स्वजनों पर इस प्रकार की करुणा का अनुमोदन नहीं किया।

                           जय जय श्री राधे

                                                               प्रणाम

                                                   अन्नपूर्णा शर्मा


English Translation 

Title - Chapter 2 Essence of Gita

Shlok one and two. ---- This chapter teaches us to self-realization through analytical study of the physical body and soul, which has been explained by the Supreme Authority Lord Krishna. This realization is possible only when human beings act in a selfless spirit. and attain self-realization. Therefore, Lord Krishna etc. is the source of both the Supreme Truth, the Supreme Soul and the Absolute Brahma. Krishna said to Arjuna-- Madhusudan Krishna uttered these words on seeing Arjuna with tears filled with sorrow filled with compassion. Shri Bhagwan said - O Arjuna! How did this contamination come in your mind? It is not at all favorable for a man who knows the value of life. This leads to failure not of the high world but of failure. Summary of Shloka --- In Shlok 1 and 2 of Adhyay 2 of Shrimad Bhagavad Gita, it is being explained by Shri Krishna to Arjuna that compassion, grief and tears for his material objects are all signs of not knowing the real soul. Compassion towards the eternal soul is self-realization. In this verse the word "Madhusudan" is important. has been alienated. No one knows where compassion should be exercised. Compassion for the clothes of a drowning man would be foolishness, a man who has fallen into the ocean of ignorance cannot be saved by merely protecting his outer garment, that is, the gross body. One who does not know this and the outer The one who does clothes for the sake of clothes is called Shudra, that is, he does only hobbies. Arjun was a Kshatriya, so he did not expect such behavior, but Lord Krishna can destroy the passion of a wise man and for this purpose he preached the Bhagavad Gita. Shri Krishna and God are inseparable, that's why Shri Krishna is called God in the entire Gita. The Supreme Lord is the culmination of the Absolute Truth. Realization of the Absolute Truth occurs in three states of knowledge – Brahma or the impersonal omnipresent consciousness, the Supreme Self or the inner form of the Supreme Lord who is in the heart of all living beings and the Lord or Sri Lord Krishna. The concept of the Absolute Truth is stated in the rmad-Bhāgavatam as follows:--"The knower of the Absolute Truth experiences the Absolute Truth in three states of knowledge, and all these states are one form. It is expressed in the form of Brahma, Paramatma and God. She goes." These three divine aspects can be explained by the illustration of the sun because it also has 3 different sides---the sun (light), the surface of the sun and the sun itself. He who studies the light of the sun. is a novice. One who understands the surface of the Sun is a little advanced. And the one who can enter the Sun world is the highest knowledgeable. The novice is satisfied only by the knowledge of Suryaprakash—his universal and unbroken effulgence of his impersonal nature. He is like a person who can understand only the outer form of the Absolute Truth. A person who is a little more knowledgeable can know about the sun sphere, which is compared with the divine form of the Absolute Truth. The person who can enter the inner world of the sun is compared with the one who experiences the real form of the Absolute Truth. Therefore the devotees who have realized the Lord form of the Absolute Truth are the highest spiritualists, although all the students engaged in the study of the Absolute Truth are engaged in the study of only one subject. --- These three cannot be separated from each other, yet the students of all the three states are not of the same category. The Sanskrit word "Lord" is interpreted by Parashara Muni, father of Vyasa Deva. The Supreme Person, who has all the wealth, power, fame, beauty, knowledge and renunciation, is called the Supreme Personality of Godhead. Maybe he has all the money, power etc. Only Krsna can make such a claim because He is God. No living being, including Brahma, Shiva or Narayan, is as full of opulence as Krishna. Therefore, in the Brahma Samhita, it is the decision of Brahma himself that Shri Krishna himself is God. No one is equal to him or greater than him. He is the Aadi Swami or the Lord, known in the form of Govinda and the chief cause of all causes--"There are many men who are possessed of the qualities of the Lord, but Krsna is the Supreme because there is no one greater than Him. is man and his body is sacchidanandamay. (  Brahma Samhita  5 ;1) The Bhagavatam also lists the various incarnations of the Lord, but Krishna is described as the original God, from whom many incarnations and Gods extend ---" The lists of all the incarnations described here are either part-kalas or complete-kalas of the Lord, But Krishna himself is God." ( Bhagwat) It is absolutely unbearable for Arjuna to mourn for his loved ones in the presence of the Lord. Therefore Krishna expressed his surprise with the word kutta. Such filthiness is not expected from a person of a civilized caste like Arya. The word Arya is applied to those persons who know the value of life and whose civilization, self Depends on realization. Human beings motivated by soul-intelligence do not have the knowledge that the aim of life is the realization of the Supreme Truth, Vishnu or the Supreme Personality of Godhead. What is it? Those men who have no knowledge of liberation from material bondage are called Anarya. Although Arjuna was a Kshatriya, he was being distracted from his duty by war. This cowardice of his could be beautifying only to non-Aryans. Such deviation from the path of duty would neither help in progress in spiritual life. Nor can this world fame be gained. Jai Jai Shree Radhe Greetings Annapurna Sharma

अपने कर्तव्य का ज्ञान गुरु कृष्ण से प्राप्त करना

 अपने कर्तव्य का ज्ञान गुरु कृष्ण से प्राप्त करना---- अब मैं अपनी कृपण दुर्बलता के कारण अपना कर्तव्य भूल गया हूं और सारा धैर्य खो चुका हूं। ऐसी अवस्था में, मैं आपसे पूछ रहा हूं कि जो मेरे लिए श्रेयस्कर हो उसे निश्चित रूप से बताएं। अब मैं आपका शिष्य हूं और आपका शरणागत हूं कृपया मुझे उपदेश दे।

          श्लोक का सार। -----  श्रीमद भगवत गीता के अध्याय 2 के श्लोक 7 में अर्जुन द्वारा अपने आप को कृपाण बताया गया है ।और वो कृष्ण को गुरु बना कर अपनी इस दुर्बलता को हटाना चाहता है।  और इसी हेतु वह कृष्ण से उपदेश प्राप्त करना चाहता है ।यह प्राकृतिक नियम है कि भौतिक कार्यकलाप की प्रणाली ही हर एक के लिए चिंता का कारण है ।पग-पग पर उलझन मिलती है ,अतः प्रामाणिक गुरु के पास जाना आवश्यक है ।जो जीवन के उद्देश्य को पूरा करने के लिए समुचित पथ -निर्देश दे सके ।समग्र वैदिक ग्रंथ हमें यह उपदेश देते हैं कि जीवन की अनचाही उलझनों से मुक्त होने के लिए प्रमाणिक गुरु के पास जाना चाहिए। ये उलझने  उस दवाग्नि के समान है जो किसी के द्वारा लगाए बिना भभक उठती है।

              इसी प्रकार विश्व की स्थिति ऐसी है कि बिना चाहे जीवन की उलझने  स्वत: ही उत्पन्न हो जाती हैं ।कोई नहीं चाहता कि आग लगे किंतु फिर भी वह लगती है और हम अत्यधिक व्याकुल हो उठते हैं ।अतः वैदिक वांग्मय  उपदेश देता है कि जीवन की उलझन को समझने तथा उनका समाधान करने के लिए हमें परंपरागत गुरु के पास जाना चाहिए ।जिस व्यक्ति का प्रामाणिक गुरु होता है वह सब कुछ जानता है ।अतः मनुष्य को भौतिक उलझनों में ना रहकर गुरु के पास जाना चाहिए यही 7 वें  श्लोक का तात्पर्य है या सार है ।इसको और अधिक विस्तार से समझने के लिए एक कहानी का सहारा लिया जा सकता है जो कि इस प्रकार है  -----

    कहानी----  एक आदमी घोड़े पर कहीं जा रहा था ,घोड़े को जोर की प्यास लगी  थी ।कुछ दूर कुए पर एक किसान बैलों से "रहट" चलाकर खेतों में पानी लगा रहा था ।मुसाफिर कुए पर आया और घोड़े को रहट में से पानी पिलाने लगा पर जैसे ही घोड़ा झुक कर पानी पीने की कोशिश करता "रहट" की ठक-ठक की आवाज से डरकर पीछे हट जाता। फिर आगे बढ़कर पानी पीने की कोशिश करता और फिर "रहट" कि ठक -ठक से डरकर हट जाता ।मुसाफिर कुछ क्षण तो यह देखता रहा फिर उसने किसान से कहा कि थोड़ी देर के लिए अपने बैलों को रोक ले ताकि रहट की ठक- ठक बंद हो और घोड़ा पानी पी सके ।किसान ने कहा कि जैसे बैल रुकेंगे कुएं में से पानी आना बंद हो जाएगा इसलिए पानी तो इसे ठक -ठक की आवाज में ही पीना पड़ेगा ।

         ठीक ऐसे ही यदि हम सोचे कि जीवन की ठक -ठक (हलचल) बंद हो तभी हम भजन ,संध्या ,वंदना आदि करेंगे तो यह हमारी भूल है ।हमें भी जीवन की इस ठक -ठक (हलचल )में से ही समय निकालना होगा तभी हम अपने मन की तृप्ति कर सकेंगे वरना उस घोड़े की तरह हमेशा प्यासे ही रहना होगा ।सब काम करते हुए ,सब दायित्व निभाते हुए प्रभु सुमिरन में भी लगे रहना होगा। जीवन मेंठक-ठक तक तो चलती ही रहेगी। 

        आखिर भौतिक उलझनों में कौन सा व्यक्ति पड़ता है? वह जो जीवन की समस्याओं को नहीं समझता बृहदारण्यक उपनिषद में (3; 8; 10 ) व्याकुल मनुष्य का वर्णन इस प्रकार हुआ है---" कृपण वह है जो मानव जीवन की समस्याओं को हल नहीं करता और आत्म साक्षात्कार के विज्ञान को समझे बिना कूकर --सूकर की भांति इस संसार को त्याग कर चला जाता है" ।जीव के लिए यह मनुष्य जीवन अत्यंत मूल्यवान निधी है। जिसका उपयोग वह जीवन की समस्याओं को हल करने में कर सकता है। अतः जो इस अवसर का लाभ नहीं उठाता वह कृपण है ।ब्राह्मण इसके विपरीत होता है ।जो इस शरीर का उपयोग जीवन की समस्त समस्याओं को हल करने में करता है। देहात्म बुद्धि वश  कृपण, या कंजूस लोग अपना सारा समय परिवार, समाज देश आदि के अत्यधिक प्रेम में गवा देते हैं ।मनुष्य प्राय: चर्म रोग के आधार पर अपने पारिवारिक जीवन अर्थात पत्नी, बच्चों तथा परिजनों में आसक्त रहता है ।कृपण यह सोचता है कि वह अपने परिवार को मृत्यु से बचा सकता है अथवा वह  यह  सोचता है कि उसका परिवार या समाज उसे मृत्यु से बचा सकता है ऐसी पारिवारिक आसक्ति निम्न पशुओ में भी पाई जाती है ,क्योंकि वे भी बच्चों की देखभाल करते हैं।

     बुद्धिमान होने के कारण अर्जुन समझ गया था कि  पारिवारिक सदस्यों के प्रति उसका अनुराग तथा मृत्यु से उनकी रक्षा करने की उसकी इच्छा ही उसकी उलझनों का कारण है। यद्यपि वे समझ रहा था कि युद्ध करने का कर्तव्य उसकी प्रतीक्षा कर रहा था किंतु कृपण दुर्बलता के कारण वह अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा था ।अतः वह परम गुरु भगवान कृष्ण से कोई निश्चित हल निकालने का अनुरोध कर रहा है। वह कृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण करता है। वह मित्रता पूर्ण बातें बंद करना चाहता है ।गुरु तथा शिष्य की बातें गंभीर होती हैं और अब अर्जुन अपने मान्य गुरु के समक्ष गंभीरता पूर्वक बातें करना चाहता है ।इसीलिए "कृष्ण भगवत गीता ज्ञान के आदि गुरु हैं और अर्जुन गीता समझने वाला प्रथम शिष्य है "।अर्जुन भगवत गीता को किस तरह समझता है यह गीता में वर्णित है तो भी मूर्ख संसारी विद्वान बताते हैं कि किसी को मनुष्य रूप कृष्ण की नहीं बल्कि अजन्मा कृष्ण की शरण ग्रहण करनी चाहिए ।कृष्ण के अंत:  तथा बाह्य में कोई अंतर नहीं है।  इस ज्ञान के बिना जो भगवद्गीता को समझने का प्रयास करता है वह सबसे बड़ा मूर्ख है।

                    भगवान के प्यार पर बस भरोसा

                                होना चाहिए

                   शक तो पूरी दुनिया करती है

                   तेरा भरोसा पूरा होना चाहिए।।

                              जय जय श्री राधे

                                                       प्रणाम

                                                 अन्नपूर्णा शर्मा



English Translation

Title - Getting knowledge of one's duty from Guru Krishna   

Getting the knowledge of my duty from Guru Krishna ---- Now I have forgotten my duty because of my miserly weakness and have lost all patience. In such a situation, I am asking you to definitely tell me which one is preferable to me. Now I am your disciple and taking refuge in you, please preach to me.


          The essence of the verse ----- In Shlok 7 of Adhyay 2 of Shrimad Bhagavad Gita, Arjuna has described himself as Kripan. And he wants to remove this weakness by making Krishna his Guru. And that's why he wants to receive instruction from Krishna. It is a natural law that the system of material activity is the cause of concern for everyone. One gets confused at every step, so it is necessary to go to the authentic Guru. The entire Vedic texts give us instructions that to get rid of the unwanted entanglements of life, one should go to the authentic Guru. This entanglement is like a fire that burns without being put on by anyone.


              Similarly, the condition of the world is such that without wanting life's complications arise automatically. No one wants fire to start but still it starts and we get very disturbed. To understand the confusion and to solve them, we should go to the traditional Guru. The person who has the authentic Guru knows everything. Therefore one should go to the Guru without getting into material confusions. This is the meaning of 7th verse. Or is the essence. To understand this in more detail, a story can be taken which is as follows-----


    Story--- A man was going somewhere on a horse, the horse was very thirsty. Some distance away a farmer was putting water in the fields by running "Rahat" with oxen. But as soon as the horse tried to drink water by bowing down, it would back away fearing the sound of "Rahat" thumping. Then he would go ahead and try to drink water and then he would go away fearing the thk of "Rahat". The traveler kept watching this for a few moments then he asked the farmer to stop his oxen for a while so that the thak-thak of Rahat Shut down and the horse can drink water. The farmer said that as the bulls stop, the water will stop coming from the well, so the water will have to be drunk only at the sound of thak-thak.


         In the same way, if we think that the hustle and bustle of life should stop only then we will do Bhajan, Sandhya, Vandana etc., then it is our mistake. We will be able to satisfy our mind or else we will always have to be thirsty like that horse. While doing all the work, performing all the responsibilities, one will also have to be engaged in the Lord Sumiran. Life will continue to go on till the end.


        After all, which person falls into material entanglements? He who does not understand the problems of life In the Brihadaranyaka Upanishad (3; 8; 10) the troubled man has been described as follows-- "The miser is one who does not solve the problems of human life and does not understand the science of self-realization." The cooker leaves this world like a pig". Which he can use to solve the problems of life. So one who does not take advantage of this opportunity is a miser. A brahmin is the opposite. One who uses this body to solve all the problems of life. Miserly due to physical intelligence, or miserly people waste all their time in excessive love of family, society, country etc. Man is often attached to his family life i.e. wife, children and family on the basis of skin disease. Miserable thinks this. That he can save his family from death or he thinks that his family or society can save him from death Such family attachment is also found in lower animals, because they also take care of children.


     Being intelligent, Arjuna understood that his affection for family members and his desire to protect them from death was the cause of his confusion. Although he understood that the duty of fighting was waiting for him but due to miserly weakness he was not performing his duty. So he is requesting the Supreme Guru Lord Krishna to find out some definite solution. He assumes the discipleship of Krishna. He wants to stop friendly talk. The talks of the guru and the disciple become serious and now Arjuna wants to talk seriously before his accepted guru. That is why "Krishna is the first teacher of Bhagavad Gita knowledge and Arjuna is the first disciple to understand the Gita." "How Arjuna understands the Bhagavad Gita is described in the Gita, yet foolish worldly scholars tell that one should take refuge in the unborn Krishna, not Krishna in human form. There is no difference between Krishna's inner and outer . One who tries to understand the Bhagavad-gita without this knowledge is the biggest fool.


  just trust in god's love

   should be

   the whole world doubts

Your trust must be fulfilled.

 

Jai Jai Shree Radhe

    Greetings

Annapoorna Sharma           

श्रीमद भगवद गीता अध्याय 2 के श्लोक 16 और 17

  श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 के श्लोक 16 और 17  --- इन श्लोकों में तत्वदर्शीयों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि असत् (भौतिक शरीर) का तो कोई चीर ...